प्रवासियों ने 2021 में 87 अरब डॉलर (करीब 6.5 लाख करोड़ रु.) भारत भेजे। यह रकम 2020 से 4.6% ज्यादा है। ये आंकड़े प्रवासी भारतीयों की आर्थिक ताकत बताते हैं, लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष प्रवासी भारतीयों का ‘सॉफ्ट पावर’ है। इसके चलते ही ही व्हाइट हाउस में दिवाली सेलिब्रेशन होता है, तो यूनाइटेड अरब एमिरेट्स यानी UAE में करोड़ों रुपए का हिंदू मंदिर बनकर तैयार है।
प्रवासियों का मतलब ब्रेन ड्रेन नहीं ब्रेन गेन
प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की शुरुआत 2003 में हुई थी। इसके लिए लक्ष्मीमल सिंघवी समिति ने सिफारिश की थी। 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था- हम ब्रेन ड्रेन को अब ब्रेन गेन में बदलने के रास्ते पर चल रहे हैं। हम चाहते हैं कि दूसरे देशों में रह रहे भारतीयों को ‘अधिकतम सुविधा’ और ‘न्यूनतम असुविधा’ मिले। इससे देश को फायदा होगा।
इसका असर भी देखने को मिला। वक्त के साथ प्रवासी भारतीय हर तरह से मजबूत होते चले गए। आज अमेरिका और यूरोप से लेकर गल्फ कंट्रीज तक उनकी ताकत देखी जा सकती है। अमेरिका में लॉबीइंग का मामला हो या इंडोनेशिया में कल्चरल एंगेजमेंट, आपको प्रवासी भारतीयों की मौजूदगी हर जगह मिलेगी। हाल ही में जी-20 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीयों को संबोधित करते हुए इसका जिक्र भी किया था।
अमेरिका में प्रेसिडेंट जो बाइडेन के एडमिनिस्ट्रेशन को ही देख लें। उनके एडमिनिस्ट्रेशन में 80 से ज्यादा भारतवंशी अहम पदों पर तैनात हैं। यही हालात ब्रिटेन और कनाडा के भी हैं।
UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए प्रवासी अहम
आबादी के लिहाज से भारत इस वक्त दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। हमारी जनसंख्या करीब 1 अरब 30 करोड़ है और इस मामले में सिर्फ चीन हमसे आगे है। एक अनुमान के मुताबिक, अप्रैल 2023 में भारत आबादी के लिहाज से चीन को पीछे छोड़ देगा।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और आबादी के लिहाज से दूसरे नंबर पर आने वाला भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य नहीं है। चीन वहां मौजूद है और किसी कीमत पर भारत को इस क्लब में शामिल नहीं होने देना चाहता।
प्रवासी भारतीयों की ताकत और लॉबीइंग भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल करने में अहम भूमिका निभा सकती है। अमेरिका और दूसरे वेस्टर्न कंट्रीज में ये लोग जबरदस्त कोशिश भी कर रहे हैं। उम्मीद है उन्हें जल्द कामयाबी मिलेगी, क्योंकि दुनिया भी भारत के साथ खड़ी है।
UNSC में पांच देश हैं। ये हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन। इनमें से सिर्फ चीन ऐसा है जो भारत को इस क्लब में शामिल करने के खिलाफ है। बाकी चारों देश हमारे साथ हैं। जाहिर है देर सवेर चीन को भी दुनिया के दबाव के सामने झुकना पड़ेगा।
सॉफ्ट पावर से पॉलिटिकल पॉवर तक का सफर
प्रवासी भारतीयों ने अपने सॉफ्ट पावर को ही ताकत बनाया। वक्त गुजरने के साथ वो इकोनॉमिक, एजुकेशनल और बाद में पॉलिटिकल पावर बनते गए। हालांकि, ताकतवर या अमीर देशों के लिहाज से इसे देखा जाए तो यह अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में ज्यादा नजर आती है। अब ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश भी इसमें शामिल हो रहे हैं।
कल्चर : इसमें आप रेडियो, टीवी, फिल्म के साथ डांस और दूसरे आर्ट फॉर्म रख सकते हैं। आज अमेरिका और यूरोप के कई देशों में हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं के एफएम रेडियो स्टेशन हैं। प्रियंका चोपड़ा, फ्रीडा पिंटो और मीरा नायर बॉलीवुड के साथ हॉलीवुड के भी कामयाब नाम हैं।
रिलीजन : हिंदुओं के अलावा दूसरे मजहबों के लोग सोशल वेलफेयर के काम करते हैं। मसलन, अमेरिका में हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन है। इसके अलावा खालसा फूड पेंट्री और खालसा पीस कॉर्प्स जैसे ऑर्गनाइजेशन भी एक्टिव हैं।
एजुकेशन : 2018 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिका और यूरोप में लोकल लोगों से तीन गुना (करीब 44%) ज्यादा भारतीयों के पास पीएचडी और दूसरी मास्टर्स डिग्री हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय एजुकेशन के मामले में बहुत आगे हैं। इस सेक्टर में आप योग और आयुर्वेद को अहम पायदान पर रख सकते हैं। अब तो गल्फ देशों में भी इंडियन IT के साथ योग और आयुर्वेद का परचम लहरा रहा है।
इनकम : अमेरिका में प्रवासी भारतीय सबसे ज्यादा अमीर हैं। प्रवासी और भारतीय मूल के लोगों की एवरेज इयरली इनकम करीब 89 हजार डॉलर है। अमेरिकी नागरिकों की सालाना आय करीब 50 हजार डॉलर सालाना है।
पॉलिटिकल : अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अक्टूबर 2021 में कहा था- आज हम किसी भी क्षेत्र में भारतीयों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसमें पॉलिटिक्स भी शामिल है। कमला हैरिस, निक्की हैली और राजीव शाह को आज कौन नहीं जानता। बहुत मुमकिन है अमेरिका का अगला राष्ट्रपति भारतीय मूल का ही हो। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक तो भारतीय मूल के ही हैं। भारत और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर डील के पीछे प्रवासी भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने इसके लिए तगड़ी लॉबीइंग की थी।
नेशनल इमेज : 1970 तक अमेरिका और यूरोप में भारत को एक पिछड़ा देश माना जाता था। अब IT, वर्ल्ड फॉर्मेसी और डिजिटल करंसी के मामले में भारत दुनिया का लीडर है। दुनिया की पांचवी बड़ी इकोनॉमी है। इसमें प्रवासी भारतीयों का भी अहम योगदान है। जाहिर है देश की ग्लोबल इमेज बहुत बेहतर हुई है।

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